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गणेश चतुर्थी क्यों मनाई जाती हैं? - ganesh chaturthi kyo manai jati hai

गणेश चतुर्थी हिंदू धर्म में भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है। यह पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है, जो आमतौर पर अगस्त या सितंबर में पड़ता है। यह त्योहार विशेष रूप से महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और अन्य भारतीय राज्यों में धूमधाम से मनाया जाता है। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता (बाधाओं को दूर करने वाला) और बुद्धि, समृद्धि व सौभाग्य का देवता माना जाता है।



गणेश चतुर्थी के पीछे की कहानी:

गणेश चतुर्थी से जुड़ी कई पौराणिक कथाएँ हैं, लेकिन सबसे प्रचलित कहानी भगवान गणेश के जन्म से संबंधित है:

  1. गणेश जी का जन्म:
    पौराणिक कथा के अनुसार, माता पार्वती ने अपने शरीर के मैल (उबटन) से एक बालक का निर्माण किया और उसे अपने स्नान के समय द्वार पर पहरेदार बनाकर खड़ा किया। जब भगवान शिव वहाँ आए, तो बालक गणेश ने उन्हें अंदर प्रवेश करने से रोका, क्योंकि वे माता पार्वती के आदेश का पालन कर रहे थे। क्रोधित होकर शिवजी ने बालक का सिर धड़ से अलग कर दिया। जब पार्वती को यह पता चला, तो वे दुखी हो गईं और उन्होंने शिवजी से अपने पुत्र को जीवित करने की प्रार्थना की। शिवजी ने तब एक हाथी के बच्चे का सिर गणेश के धड़ से जोड़ा और उन्हें जीवित कर दिया। इस तरह गणेश जी का जन्म हुआ और उन्हें प्रथम पूज्य होने का वरदान मिला।
  2. गणेश चतुर्थी की शुरुआत:
    मान्यता है कि इस दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था, इसलिए इसे उनके सम्मान में मनाया जाता है। यह पर्व भक्तों के लिए नई शुरुआत, बाधाओं को दूर करने और सुख-समृद्धि की कामना का प्रतीक है।

उत्सव का महत्व:

  • आध्यात्मिक महत्व: गणेश चतुर्थी बुद्धि, ज्ञान और समृद्धि की प्राप्ति के लिए मनाई जाती है। भक्त गणेश जी की पूजा करते हैं ताकि उनके जीवन की सभी बाधाएँ दूर हों।
  • सामाजिक महत्व: यह पर्व समुदाय को एकजुट करता है। लोग पंडालों में गणेश प्रतिमा स्थापित करते हैं, भजन-कीर्तन करते हैं और सामूहिक उत्सव मनाते हैं।
  • पर्यावरणीय संदेश: आजकल लोग पर्यावरण के प्रति जागरूकता के साथ मिट्टी की मूर्तियों का उपयोग करते हैं और विसर्जन को पर्यावरण-अनुकूल तरीके से करने का प्रयास करते हैं।

उत्सव का स्वरूप:

  • गणेश स्थापना: घरों और सार्वजनिक पंडालों में गणेश जी की मूर्ति स्थापित की जाती है।
  • पूजा-अर्चना: दस दिनों तक गणेश जी की पूजा, भोग (मोदक, लड्डू आदि), और आरती की जाती है।
  • विसर्जन: अंतिम दिन (अनंत चतुर्दशी) गणेश जी की मूर्ति को जल में विसर्जित किया जाता है, जिसके साथ भक्त “गणपति बप्पा मोरया” के नारे लगाते हैं।

यह पर्व भक्ति, उत्साह और सामुदायिक एकता का प्रतीक है। क्या आप गणेश चतुर्थी के किसी विशिष्ट पहलू, जैसे पूजा विधि या क्षेत्रीय परंपराओं के बारे में और जानना चाहेंगे?

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